Sunday, 24 October 2010

एकांत

दोपहर की उमस में,
उदास मन,
गरम हवाओ के संग,
सूखे पत्तो की सरसराहट,
और,
मन के उजरे कोने में,
तुम्हारे कदमो की आहट,
इन सब से अलग,
कुछ और भी उजरा है !!

मिटटी में आई दरार तो है नहीं,
की आसूओ से भर दू,
मन में आई फ़ास है,
एक काटा है जो चुभता है,
हर पल के साथ,
दिल के बंद कमरे में,
विरह के टूटे माले सा !!

कैसे बीतेगा हर पल,
दर्द के साथ,
काश की भर जाता जख्म,
वक़्त के साथ !!

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